माता का आँचल पाठ का सारांश | NCERT Class 10 Hindi Kritika Chapter 1


माता का आँचल पाठ का सारांश | NCERT Class 10 Hindi Kritika Chapter 1 : Hello there, students! I’m Yugant Barbate from Noteswala. Today, I’m going to give you with a CBSE  माता का आँचल पाठ का सारांश that will support you in boosting your understanding. You can improve your grades in class, periodic tests, and the CBSE board exam by using this CBSE  माता का आँचल पाठ शब्दार्थ . You can also download the माता का आँचल पाठ का भावार्थ for free from this page. So, without further ado, let’s get start learning. माता का आँचल पाठ की व्याख्या









माता का आँचल पाठ का सारांश | NCERT Class 10 Hindi Kritika Chapter 1





NCERT Class 10 Hindi Kritika Chapter 1 Summary माता का आँचल, (हिंदी) परीक्षा कुछ राज्य बोर्ड और CBSE Schools में छात्रों को NCERT Book के माध्यम से पढ़ाया जाता है। चूंकि अध्याय का अंत शामिल है, इसलिए छात्रों को मूल्यांकन के लिए तैयार करने में सहायता करने के लिए एक अभ्यास प्रदान किया गया है। छात्रों को उन अभ्यासों को बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट करने की आवश्यकता है क्योंकि अंत में प्रश्न उनसे ही पूछे जाते हैं।





कभी-कभी, छात्र अभ्यास के अंदर फंस जाते हैं और सभी प्रश्नों को हल नहीं कर पाते हैं। छात्रों की सहायता करने, सभी प्रश्नों को हल करने और बिना किसी संदेह के उनकी पढ़ाई को बनाए रखने के लिए, हमने सभी कक्षाओं के छात्रों के लिए चरण-दर-चरण NCERT Summary प्रदान किया है। ये उत्तर ठीक से सचित्र नोट्स की सहायता से छात्रों को बेहतर अंक प्राप्त करने में मदद करेंगे, इसी तरह छात्रों की सहायता करने और प्रश्नों का सही उत्तर देने का एक तरीका है।





माता का आँचल पाठ का सारांश





प्रस्तावना - लेखक ने माता का अँचल' पाठ में शैशव-काल के शैशवीय क्रियाकलापों को रेखांकित किया है, जिसमें माता-पिता के स्नेह तथा शिशुमंडली द्वारा मिल-जुलकर खेले जाने वाले खेलों को उद्धृत किया है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि शिशु का पिता उसके साथ भले ही अधिक समय बिताता हो, दोनों भले ही एक-दूसरे के साथ अत्यधिक स्नेह करते हो, किंतु आपदाओं में माँ के अंचल में ही शिशु को शरण मिलती है। ऐसे समय में पिता से अधिक माता की गोद प्रिय और रक्षा करने में समर्थ प्रतीत होती है।





बचपन से पिता के साथ अधिक - लेखक बचपन से ही पिता के साथ अधिक रहता था माता से दूध पीने तक संबंध था पिता जी नहा-धोकर पूजा पर बैठते, साथ ही लेखक को भी नहला-धुलाकर पूजा में शामिल कर लेते माथे पर भमूत का तिलक लगाते सिर पर लंबी-लंबी जटाएँ तो थीं, उन पर भभूत लगाने से लेखक बम भोला बन जाया करता था पिता जी प्यार से भोलानाथ कह पुकारा करते थे। जबकि लेखक का नाम तारकेश्वर नाथ था में (लेखक) पिता जी को बाबू जी और माँ को मइयाँ कहकर पुकारता था पिता जी रामायण का पाठ करते थे तो मैं उनके पास बैठा आईने में अपना मुँह निहारा करता था। पिता जी के देखने पर शमांकर आईंना नीचे रख देता था और यह देखकर पिता जी मुस्करा देते थे।





पिता जी की 'रामनामा वही' और राम-नाम की गोलियों पिता जी पूजा-पाठ के बाद अपनी 'रामनामा बही' में राम राम लिखते। इसके बाद कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों पर राम-नाम लिखकर और उन्हें आटे की गोलियों में लपेटकर गंगा पर जाकर आटे की एक-एक गोली फेंककर मछलियों को खिलाते उस समय में उनके कंधे पर बैठा होता था। पिता जी की गोली फेंकना देखकर में हँसा करता था गंगा से जब लौटते तो पिता जी रास्ते में झुके पेड़ों की डालों पर बैठाकर (लेखक को) झूला झुलाते थे। कभी-कभी हमसे कुश्ती लड़ते थे और खुद नीचे गिर जाते थे और में उनकी छाती पर चढ़कर उनकी मूँछे उखाड़ने लगता था। वे मूठे छुड़ाकर हंसते हुए मुझे चूम लेते थे। मुझसे खट्टा-मीठा चुम्मा माँगते थे। में उनके सामने अपने गाल कर देता था। एक खट्टा चुम्मा दूसरा मीठा चुम्मा लेते तो मूठे गड़ा देते थे में झुंझला पड़ता था और पिता जी बनावटी रोना रोते थे और में खिल-खिलाकर हँसने लगता था।





गोरस और भात का भोजन-पिता जी गोरस और भात को फूल के कटोरे में सानकर खिलाते थे माँ और खिलाने की हठ करती थी। माँ पिता जी से कहती कि बच्चे को खिलाने का ढंग मर्द नहीं जानते चार-चार दाने का कौर देने से बच्चा समझता है कि बहुत खा लिया है। बच्चे को भर-मुँह खिलाना चाहिए। माँ खुद खिलाने लगती और कहती कि महतारी के हाथ से खाने पर बच्चे का पेट भरता है माँ खिलाती और कहती कि यह तोता के नाम का कीर है और यह कबूतर के नाम का कीर है ऐसे खूब खिला देती। तब पिता जी खेलने के लिए कहते हम खेलने निकल जाते।





माँ तेल की उबटन करती तब तरह-तरह के खेल-कभी माँ अचानक पकड़ लेती और मेरे सिर पर कड़वा तेल डालकर सिर की मालिश करती में छटपटाता और रोने लगता, पिता जी बिगड़ उठते किंतु माँ उबटकर ही छोड़ती थी। फिर माथे पर काजल की बिंदी लगाकर चोटी गूंथती, चोटी में फूलदार लट्टू बाँधती और रंगीन कुरता-टोपी पहनाकर कन्हैया बनाकर तैयार करती और मैं सिसकता रहता पिता जी गोद में उठाकर बाहर ले आते जैसे ही बाहर आते और इंतज़ार करते हुए बालकों के झुंड को देखते ही में सिसकना भूलकर पिता जी की गोद से उतरकर बालकों के झुंड में मिलकर खेलने लग जाता और तरह-तरह के नाटक करने लग जाता था। वहीं चबूतरे के एक कोने में सब खेल खेलते पिता जी की नहाने वाली चौकी को लेकर उस पर सरकंडे के खंभे बनाते कागज़ का टेंट लगाते, मिठाइयों की दुकान लगाते, मिट्टी के देशों के लड्डू बनाते, पत्तों की पूड़ी कचौड़ी, गीली मिट्टी की जलेबी फूटे पड़ों के टुकड़ों के बताशे बनाते और दुकान सजाते।





उन्हीं ठीकरों और जस्ते के छोटे-छोटे टुकड़ों के पैसे बनाते हम बच्चों में से ही खरीददार होते और हममें से ही दुकानदार होते थे। थोड़ी देर बाद मिठाई की दुकान बंद कर परीदा बनाते रेत की मेड़ ही दीवार बनती, तिनकों का छप्पर, दातून के खंभे दिवासलाई की पेटियों की किवाड़, पानी का घी, बालू की चीनी, ऐसे ही यहाँ के टुकड़ों का प्रयोग कर ज्योनार तैयार करते हम ही बच्चे पंगत में बैठते। पंगत में धीरे से आकर बाबू जी बैठ जाते थे। उनको बैठते देखते ही हम बच्चे घरादा बिगाड़कर भाग उठते थे। यह भी हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते थे और पूछते "फिर कब होगा भोज भोलानाथ





बच्चों की बारात और खेती-कभी बच्चे बारात निकालते कनस्तरों का तंबूरा बजता, आम की उगी हुई गुठली को पिसकर शहनाई बनती। हममें से कोई दूल्हा, समधी आदि बनते थे बारात चबूतरा के एक कोने से दूसरे कोने तक जाकर लौट आती थी। जिस कोने पर बारात जाती थी उस कोने को आम के पत्तों और केलों के पत्तों से सजाया जाता था। लाल कपड़े से ढककर एक पालकी में दुलहिन बैठा दी जाती थी। बारात के लौटने पर पिता जी पालकी के कपड़े को ऊपर कर देखते थे तो हम हँसकर भाग जाते थे।





थोड़ी देर में बच्चों की मंडली खेती करने के लिए जुटती बस चबूतरे के एक कोने पर घिरनी गड़ जाती और नीचे की गली कुआ बन जाती । मूँज की पतली रस्सी बनाकर घिरनी पर चढ़ा, चुक्कड़ बाँध लटका दिया जाता। दो लड़के बल बनते, पानी खींचने लग जाते चबूतरा खेत बनता, कंकड़ बीज बनते। मेहनत से खेत जोते-बोए जाते फसल तैयार हुई हाथों-हाथ काट लेते उसे एक जगह रखकर पैरों से संदते, मिट्टी के बने कसोरे से उसे ओसाते। मिट्टी के बने दीओ के तराजू बनाकर, तौलकर राशि तैयार कर देते बाबू जी पूछत- "इस साल खेती कैसी रही भोलानाथ?" हम सब राशि छोड़कर भाग उठते इस तरह खेल खेलते देखकर बटोही भी रुक जाते थे।





पालकी को देख शरारत-अगर किसी दूल्हे के आगे पालकी को देख लेते थे तो खूब जोर से चिल्लाते थे- "रहरी में रहरी पुरान रहरी, डोला के कनिया हमार मेहरी" एक बार ऐसा कहने पर एक बूढ़े वर ने हम बच्चों को बहुत दूर तक खदेड़कर देलों से मारा था उस खुसर-खन्नीस की सूरत लेखक की अब तक याद है न जाने किस ससुर ने वैसा जमाई ढूंढ़ निकाला था वैसी शक्ल का आदमी हमने कभी नहीं देखा।





जब मूसन तिवारी को चिढ़ाया - एक बार जोर की आधी आई और हम सब आम के बाग की ओर दौड़ चले। आकाश काले बादलों से ढक गया मेघ गरजने लगे, बिजली काधने लगी, ठंडी हवा सनसनाने लगी, पेड़ शूमने लगे और ज़मीन को छूने लगे।





हम बच्चे चिल्ला उठे-





एक पइसा की लाई





बाजार में छितराई,





बरखा उधरे बिलाई





लेकिन वर्षा न रुकी, मूसलाधार वर्षा होने लगी हम पेड़ों की जड़ से सट गए। थोड़ी देर में वर्षा थम गई। वर्षा थमते ही बाग में बिच्छू नजर आए। हम डरकर भाग चले हममें एक बालक बैजू ढीठ था हम भागे जा रहे थे। संयोग से रास्ते में मूसन तिवारी मिल गए। बैजू ने चिढ़ाया और कहा





बुढ़वा बेईमान सांगे करैला का चोखा।





हम लोगों ने भी उसी के सुर में सुर मिलाते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया। मूसन तिवारी हम लोगों के पीछे दौड़े और हम अपने-अपने घर की ओर भाग चले हमारे न मिलने पर तिवारी पाठशाला गए और वहाँ से गुरु जी ने हमें पकड़ने के लिए चार लड़कों को भेजा जैसे ही 1





हम घर पहुंचे, वैसे ही चार लड़के आ धमके। बैजू भाग गया और में पकड़ा गया, गुरुजी ने मेरी खूब खबर ती बाबू जी को जैसे ही पता चला वे पाठशाला दौड़े चले आए, मुझे गोद में उठाया, पुचकारा और मैंने रोते-रोते आँसुओं से बाबू जी का कथा तर कर दिया। वेसे गुरु जी से प्रार्थना कर मुझे घर ले चले और रास्ते में साथी लड़कों का झुंड मिला। वे ज़ोर से नाच और गा रहे थे





"माई पकाई गरर गरर पूआ,





हम खाइब पूआ





ना खेलब जुआ।'





उन्हें देखकर हम रोना-धोना भूल गए, बाबू जी की गोद से उतर गए और लड़कों की मंडली में मिल गए और एक साथ मकई के खेत में पुस गए और चिड़िया उड़ाने लगे। एक भी चिड़िया हाथ नहीं आई। हमें चिड़िया उड़ाते देख गाँव के आदमी हंसते हुए कहने लगे





"चिड़िया की जान जाए लड़कों का खिलौना"





फिर कहा- "सचमुच लड़के और बंदर पराई पीर नहीं समझते।





चूहे के बिल से सौंप निकला - एक बार टीले पर चूहे के बिल को देखकर हम बिल में पानी उलीचने लगे उससे चूहा तो निकला नहीं; साँप निकल जाया। हम डरे और रोते-चिल्लाते भाग चले जहाँ जहाँ गिरे सारा शरीर लहूलुहान हो गया पैरों के तलवे काँटों से छलनी हो गए। मैं घर की ओर भागा बाबू जी ओसारे में हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, उन्होंने बहुत पुकारा, पर मैंने माँ की गोद में शरण ली में उनके अंचल में A छिप गया माँ सब काम छोड़कर रो पड़ी और भय का कारण पूछने लगी कभी अंग भरकर दबाती और कभी मेरे अंगों को अपने अंचल से पोंछकर चूम लेती बड़े संकट में पड़ गई। झटपट हल्दी पीसकर लगाई में सा-सा करते हुए माँ के अंचल में छिपा जा रहा था। घर में कुहराम मच गया। सारा शरीर काँप रहा था। रोंगटे खड़े हो गए थे। आँखें खोलना चाहते थे पर आँखें खुल नहीं रही थीं। मेरे काँपते हुए, होठों को देखकर मा रोती और बड़े लाड़ से गले लगाती। इसी बीच बाबू जी दौड़े आए माँ की गोद से मुझे लेने लगे। पर मैंने माँ के अंचल की प्रेम और शांति के चंदोवे की छाया न छोड़ी।





माता का आँचल पाठ का सारांश





लेखक का नाम 'तारकेश्वरनाथ' या, किंतु पिताजी लाड़ में उसे 'भोलानाथ' कहते थे भोलानाथ का अपनी माता से केवल खाना खाने एवं दूध पीने तक का नाता था। वह पिता के साथ ही बाहर की बैठक में सोया करता था। पिता प्रातः काल उठकर भोलानाथ को भी अपने साथ नहलाकर पूजा में बिठा लेते। पूजा-पाठ के बाद पिताजी अपनी एक में 'रामनाम बही' पर हजार बार राम-नाम लिखकर पाठ करने की पोथी के साथ बाँधकर रख देते थे। कभी-कभी बाबूजी और भोलानाथ के बीच कुश्ती भी होती थी।





पिताजी पीठ के बल लेट जाते और भोलानाथ उनको छाती पर चढ़कर उनकी लंबी-लंबी मूंछे उखाड़ने लगता तो पिताजी हंसते-हंसते उसके हाथों को मूंछों से छुड़ाकर उसे चूम लेते थे मोलानाथ के पिताजी उसे अपने हाथ से, फूल (एक धातु) के एक कटोरे में गोरस (दूध) और भात सानकर भी खिलाते थे।





माँ के साथ भोलानाथ का संबंध





जब भोलानाथ का पेट भर जाता तो उसके बाद भी माँ थाली में दही-भात सानती और अलग-अलग तोता, मैना, कबूतर, हंस, मोर आदि के बनावटी नाम से कौर (टुकडा) बनाकर यह कहते हुए खिलाती जाती कि जल्दी खा लो, नहीं तो उड़ जाएंगे तय भोलानाथ सब बनावटी पक्षियों को खा लेता था भोलानाथ की माँ उसे अचानक पकड़ लेती और एक चुल्लू कड़वा तेल उसके सिर पर अवश्य डालती थी तथा उसे सजा बजाकर कृष्ण कन्हैया बना देती थी।





बच्चों की शैतानियाँ और खेल





भोलानाथ के घर पर बच्चे तरह-तरह के नाटक खेला करते थे, जिसमें चबूतरे के एक कोने को नाटक घर की तरह प्रयोग किया जाता था। बाबूजी की नहाने की छोटी चौकी को रंगमंच बनाया जाता था। उसी पर मिठाइयों की दुकान, चिलम के खोचे पर कपड़े के बालों में देले के लड्डू, पक्षों की पूरी कचौरियाँ, गीली मिट्टी की जलेबियाँ, फूटे घड़े के टुकड़ों के बताशे आदि मिठाइयां सजाई जाती थीं। उसमें दुकानदार और खरीदार सभी बच्चे हो होते थे। थोड़ी देर में मिठाई की दुकान हटाकर बच्चे भरीदा बनाते थे। धूल की मेड़ दीवार बनती और तिनकों का छप्पर दातुन के खंभे दियासलाई को पेटियों के किवाड़ आदि। इसी प्रकार के अन्य सामानों से बच्चे ज्योनार (दावत) तैयार करते थे।





बच्चों के खेल में पिता का भाग लेना





जब पंगत (सभी लोगों की पंक्ति) बैठ जाती थी, तब बाबूजी भी धीरे से आकर जोमने (भोजन करने) के लिए बैठ जाते थे। उनको बैठते देखते ही बच्चे हंसते हुए घरीदा बिगाड़कर भाग जाते थे कभी-कभी बच्चे बरात का भी जुलूस निकालते थे। बरात के सौट आने पर बाबूजी जैसे ही दुलहिन का मुख निरखने लगते, वैसे ही बच्चे हंसकर भाग जाते। थोड़ी देर बाद फिर लड़कों की मंडली जुट जाती और खेती की जाती।





बड़ी मेहनत से खेत जोते-बोए और पटाए जाते थे। फसल तैयार होते देर नहीं लगती थी और बच्चे हाथों-हाथ फसल काटकर उसे पैरों से रौंद डालते और कसोरे का सूप बनाकर, ओमाकर मिट्टी के दीये के तराजू पर तौलकर के राशि तैयार कर देते थे। इसी बीच बाबूजी आकर पूछ लेते कि इस साल की खेती कैसी रही, भोलानाथ? तब बच्चे खेत-खलिहान छोड़कर हंसते हुए भाग जाते थे।





बच्चों द्वारा गुरु मूसन तिवारी को चिढ़ाना आम की फसल के समय कभी-कभी खूब आंधी आती थी। आंधी समाप्त हो जाने पर बच्चे बाग की ओर दौड़ पड़ते और चुन-चुनकर मुले आम खाते थे। एक दिन आँधी आने पर आकाश काले बादलों से ढक गया। मेघ गरजने लगे और बिजली चमकने लगी। वर्षा बंद होते ही बाग में बहुत से बिच्छू नजर आए।





बच्चे डरकर भाग गए। बच्चों में बैजू बड़ा ढीठ था। रास्ते में बच्चों को मूसन तिवारी मिल गए। बैजू वनों देखकर चिढ़ाते हुए बोला-बुद्धवा बेइमान माँगे करैला का चोखा शेष बच्चों ने बैजू के सुर में सुर मिलाकर यही चिल्लाना शुरू कर दिया। तिवारी ने पाठशाला जाकर वहाँ से बैजू और भोलानाथ को पकड़ लाने के लिए चार लड़कों को भेजा बैजू तो भाग गया और भोलानाथ पकड़ा गया, जिसको गुरुजी ने डांट लगाई बाबूजी ने जब यह हाल सुना तो पाठशाला में आकर भोलानाथ को गोद में उठाकर पुचकारा वह गुरुजी को खुशामद करके भोलानाथ को अपने साथ घर ले गए। रास्ते में भोलानाथ को साथी लड़कों का झुंड मिला। उन्हें नाचते और गाते देखकर भोलानाथ अपना रोना-धोना भूलकर बाबूजी की गोद से उतरकर लड़कों की मंडली में मिल गया।





भोलानाथ का साँप से डरकर भागना





एक टीले पर जाकर बच्चे चूहों के बिल में पानी डालने लगे। कुछ ही देर में सब थक गए तब तक बिल में से एक साँप निकल आया, जिसे देखकर रोते-चिल्लाते सब भाग गए। भोलानाथ का सारा शरीर लहूलुहान हो गया। पैरों के तलवे काँटो से छलनी हो गए। वह दौड़ा हुआ आया और घर में घुस गया। उस समय बाबूजी बैठक के ओसारे (बरामदे) हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे।





उन्होंने भोलानाथ को बहुत पुकारा पर भोलानाथ उनकी आवाज अनसुनी करके माँ के पास जाकर उसके आँचल में छिप गया। भोलानाथ को डर से काँपते देखकर माँ ज़ोर से लगी और सब काम छोड़ बैठी।





बाबूजी ने जब यह हाल सुना तो पाठशाला में आकर भोलानाथ को गोद में उठाकर पुचकारा वह गुरुजी को खुशामद करके भोलानाथ को अपने साथ घर ले गए। रास्ते में भोलानाथ को साथी लड़कों का झुंड मिला। उन्हें नाचते और गाते देखकर भोलानाथ अपना रोना-धोना भूलकर बाबूजी की गोद से उतरकर लड़कों की मंडली में मिल गया।





भोलानाथ का साँप से डरकर भागना





एक टीले पर जाकर बच्चे चूहों के बिल में पानी डालने लगे। कुछ ही देर में सब थक गए तब तक बिल में से एक साँप निकल आया, जिसे देखकर रोते-चिल्लाते सब भाग गए। भोलानाथ का सारा शरीर लहूलुहान हो गया। पैरों के तलवे काँटो से छलनी हो गए। वह दौड़ा हुआ आया और घर में घुस गया। उस समय बाबूजी बैठक के ओसारे (बरामदे) हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे।





उन्होंने भोलानाथ को बहुत पुकारा पर भोलानाथ उनकी आवाज अनसुनी करके माँ के पास जाकर उसके आँचल में छिप गया। भोलानाथ को डर से काँपते देखकर माँ ज़ोर से लगी और सब काम छोड़ बैठी।





माता का आँचल पाठ शब्दार्थ





खरचे – व्यय





अँचल – आँचल





तड़के – सवेरे





लिलार – ललाट





भभूत – राख





झँझलाकर – खीज कर





त्रिपुंड- माथे पर लगाए जाने वाला तीन आड़ी रेखाओं का तिलक





रमाने – लगाने





पोथी- धार्मिक ग्रंथ





विराजमान – उपस्थित





शिथिल – ढीला





पछाड़ना – हराना





उतान- पीठ के बल लेटना





गोरस- दूध





सानना – मिलाना





ठौर – स्थान





बोघना – भिगो देना





मरदुए – आदमी





महतारी – माता





काठ – लकड़ी





लेखक का पिता के साथ अनेक गतिविधियों में भाग लेना





माता का आँचल पाठ का सारांश | NCERT Class 10 Hindi Kritika Chapter 1


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